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महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं
श्री गुरवे नम:
हर्योल्लास-गुर्वोल्लास
महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं
विचार का कार्य है मन में वांछित व्यक्ति, वास्तु, परिस्थिति या स्थल ले आनाl भावनाएं विचार की अनुगामी होती हैंl जिस विषय पर विचार पहुँच चुके हैं उसतक पहुँच कर उसे रस मिश्रित कर (चाहे रस मीठा हो अथवा कड़वा) उसका रस इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श आदि से मन को देना भावनाओं का काम हैl अक्सर विचार बिखरे होते हैं, फलस्वरूप भावनाएं भी बिखरी होती हैं, इसलिए मन भी भ्रमित (confused) रहता है और मनुष्य आनंद रहित, निराश, अवसाद ग्रस्त या बोर बना रहता हैl
विचार और भावनाओं को केन्द्रित करने से ही यह अनानंद की स्थिति दूर होती है और यह केन्द्रीकरण होता है जब कोई संकल्प, कोई इरादा, उद्देश्य, या सेंस ऑफ़ पर्पस होता हैl
अत: प्रसन्नता के लिए सेंस ऑफ़ पर्पस अत्यंत आवश्यक हैl
सेंस ऑफ़ पर्पस दो ही हो सकते हैं, भौतिक और आध्यात्मिकl दोनों ही आवश्यक हैं, साथ साथ पूरे हो सकते हैंl गीता में श्री कृष्ण कहते ही हैं, मेरा स्मरण भी करो और युद्ध भी, इस जीवन समर में तुम्हारा योगक्षेम मैं वहन करूंगाl
इसलिए बिखरी विचारों और दिशाहीन भावनाओं से कोई भी लाभ नहीं हैl न भौतिक, न आध्यात्मिकl
विचार दिशाहीन कब होते हैं? भावनाएं भ्रमित क्यों होती है?
क्रमश:............................
श्री गुरवे नम:
श्री गुरवे नम:
हर्योल्लास-गुर्वोल्लास
विद्यालय-ग्रंथालय-गुरु श्रेष्ठ, विद्यार्थी अनुत्तीर्ण
विद्यालय में शिक्षा तो सबको मिलती है किन्तु उसे कुछ ही विद्यार्थी प्राप्त कर पाते हैंl क्यों?
हमारा गुरु तो सूर्य हो किन्तु हमारी मन-बुद्धि ग्रहण करे दीक्षा काले मेघों के अन्धकार की!!??
विचार दिशाहीन रहेंगे और भावनाएं भ्रमितl
क्या हमें सुख ही चाहिए? नहीं सुख तो सत्यं शिवं सुन्दरम्, अर्थात सच्चा, कल्याणकारी और सतत आनंददायक होता हैl कम ही लोग इसे चाहते हैंl अधिकतर लोग झूठा, अमंगलकारी और भद्दा सुख चाहते हैंl
कैसे?
साधारण व्यक्ति सुख किसे मानता है?
उस काम में जिसे वह कर चुका है (एक बार या कई बार) और उसमे उसे मज़ा मिल चुका है;
इस बात से कोई मतलब नहीं कि यह मज़ा मिला है:-
1. भले काम से या बुरे काम से,
2. परिणाम अपने या दूसरों के लिए लाभदायक है या हानिकारक,
3. दूसरों को इससे सुख हुआ है या दुःख
पाप करके, क़ानून, नियम या लाइन तोड़कर मिला मज़ा दुर्भाग्य का द्वार है लेकिन समझदार कहलाने वाले लोग भी ऐसा कर रहे हैंl
क्यों? मिल चुके मज़े को दुबारा लेने का ऐसा आकर्षण है कि कोई बिरला ही उससे बच पाता हैl हर एक को वह चाहिए जिसे वह “उस क्षण” सुख समझ रहा हैl बाद में, अपने लिए या दूसरों के लिए, परिणाम क्या होगा कोई-कोई ही यह सोचता है मज़ा लेने से पहलेl
इससे सिद्ध है कि हर कोई सुख तो चाहता है किन्तु सत्यं शिवं सुन्दरम् चाहे ऐसा बहुत कम देखा जाता हैl
यह “मिल चुका मज़ा” एक ऐसा बादल है जो आत्मा पर अध्यस्त हो जाता है और वह बादल “आत्मा रूपी सूर्य” की “विवेक रूपी” ऊष्मा और प्रकाश मन-बुद्धि तक नहीं पहुँचने देताl
परिणाम बड़ा भयानक है; “अज्ञान का अन्धकार” ही “सुख की राह” का हमारा मार्गदर्शक रहता है, गुरु नहींl
फिर चाहे ब्रह्मा जैसा गुरु ही क्यों न मिल चुका होl ऐसी स्थिति के लिए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं:
“मूरख ह्रदय न चेत जो गुरु मिलइ बिरंचि समll”
वह व्यक्ति वास्तविक रूप में बहुत बुद्धिमान होगा वह जो अन्धकार का आकर्षण ठुकरा कर प्रकाश के मार्ग पर चल पाएगा, कहना आसान है “तमसो मा ज्योतिर्गमयl” लेकिन “ज्ञान” कहने को नहीं करने को कहते हैंl याद करने और सुना देने वाला नर्सरी राइम गाने वाले बच्चे के समान ही “ज्ञानी” हैl
इसलिए सत्यं शिवं सुन्दरम् सुख की राह पर चलने के नियम हुए;
अ) पहले सावधानी भौतिक एवं आध्यात्मिक सत्यं शिवं सुन्दरम् का हितकर विवेक मन-बुद्धि में स्मरण करो
आ) हित परखो फिर चलो, लेकिन
इ) हित परखने का यह ज्ञान योग्यतम व्यक्ति से ही प्राप्त करोl
सभी भले और बड़े काम से लेकर भगवान की प्राप्ति भी इसी उसूल से ही संभव हैl
वेद और गीता भी इसी सिद्धांत का अनुमोदन करते हैंl
वेद में कठोपनिषद् का श्रेय-प्रेय मार्ग सम्बन्धी मन्त्र और गीता का ज्ञानिन: तत्वदर्शिन: सम्बन्धी श्लोकl
ऐसा मन कर क्यों नहीं पाताl
क्रमश:............................
हर्योल्लास-गुर्वोल्लास
विद्यालय-ग्रंथालय-गुरु श्रेष्ठ, विद्यार्थी अनुत्तीर्ण
विद्यालय में शिक्षा तो सबको मिलती है किन्तु उसे कुछ ही विद्यार्थी प्राप्त कर पाते हैंl क्यों?
हमारा गुरु तो सूर्य हो किन्तु हमारी मन-बुद्धि ग्रहण करे दीक्षा काले मेघों के अन्धकार की!!??
विचार दिशाहीन रहेंगे और भावनाएं भ्रमितl
क्या हमें सुख ही चाहिए? नहीं सुख तो सत्यं शिवं सुन्दरम्, अर्थात सच्चा, कल्याणकारी और सतत आनंददायक होता हैl कम ही लोग इसे चाहते हैंl अधिकतर लोग झूठा, अमंगलकारी और भद्दा सुख चाहते हैंl
कैसे?
साधारण व्यक्ति सुख किसे मानता है?
उस काम में जिसे वह कर चुका है (एक बार या कई बार) और उसमे उसे मज़ा मिल चुका है;
इस बात से कोई मतलब नहीं कि यह मज़ा मिला है:-
1. भले काम से या बुरे काम से,
2. परिणाम अपने या दूसरों के लिए लाभदायक है या हानिकारक,
3. दूसरों को इससे सुख हुआ है या दुःख
पाप करके, क़ानून, नियम या लाइन तोड़कर मिला मज़ा दुर्भाग्य का द्वार है लेकिन समझदार कहलाने वाले लोग भी ऐसा कर रहे हैंl
क्यों? मिल चुके मज़े को दुबारा लेने का ऐसा आकर्षण है कि कोई बिरला ही उससे बच पाता हैl हर एक को वह चाहिए जिसे वह “उस क्षण” सुख समझ रहा हैl बाद में, अपने लिए या दूसरों के लिए, परिणाम क्या होगा कोई-कोई ही यह सोचता है मज़ा लेने से पहलेl
इससे सिद्ध है कि हर कोई सुख तो चाहता है किन्तु सत्यं शिवं सुन्दरम् चाहे ऐसा बहुत कम देखा जाता हैl
यह “मिल चुका मज़ा” एक ऐसा बादल है जो आत्मा पर अध्यस्त हो जाता है और वह बादल “आत्मा रूपी सूर्य” की “विवेक रूपी” ऊष्मा और प्रकाश मन-बुद्धि तक नहीं पहुँचने देताl
परिणाम बड़ा भयानक है; “अज्ञान का अन्धकार” ही “सुख की राह” का हमारा मार्गदर्शक रहता है, गुरु नहींl
फिर चाहे ब्रह्मा जैसा गुरु ही क्यों न मिल चुका होl ऐसी स्थिति के लिए गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं:
“मूरख ह्रदय न चेत जो गुरु मिलइ बिरंचि समll”
वह व्यक्ति वास्तविक रूप में बहुत बुद्धिमान होगा वह जो अन्धकार का आकर्षण ठुकरा कर प्रकाश के मार्ग पर चल पाएगा, कहना आसान है “तमसो मा ज्योतिर्गमयl” लेकिन “ज्ञान” कहने को नहीं करने को कहते हैंl याद करने और सुना देने वाला नर्सरी राइम गाने वाले बच्चे के समान ही “ज्ञानी” हैl
इसलिए सत्यं शिवं सुन्दरम् सुख की राह पर चलने के नियम हुए;
अ) पहले सावधानी भौतिक एवं आध्यात्मिक सत्यं शिवं सुन्दरम् का हितकर विवेक मन-बुद्धि में स्मरण करो
आ) हित परखो फिर चलो, लेकिन
इ) हित परखने का यह ज्ञान योग्यतम व्यक्ति से ही प्राप्त करोl
सभी भले और बड़े काम से लेकर भगवान की प्राप्ति भी इसी उसूल से ही संभव हैl
वेद और गीता भी इसी सिद्धांत का अनुमोदन करते हैंl
वेद में कठोपनिषद् का श्रेय-प्रेय मार्ग सम्बन्धी मन्त्र और गीता का ज्ञानिन: तत्वदर्शिन: सम्बन्धी श्लोकl
ऐसा मन कर क्यों नहीं पाताl
क्रमश:............................
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